ना निर्णय, न न्याय! न निदान, न समाधान!

विडम्बनायें हमेशा विद्रूपताओं में ही सामने आयें यह जरूरी नहीं, वे विपरीतताओं, दर्पण की उलट छवियों – मिरर इमेज – में भी प्रकट हो सकती हैं।

उधर जिसके धर्मनिरपेक्ष होने का भ्रम और समावेशी लोकतंत्र होने का यकीन किसी को नहीं है वह पाकिस्तान परम्परा से चले आ रहे नाम बहाल कर रहा था। लाहौर में सुन्नत नगर का नाम संत नगर, इस्लामनगर का कृष्ण नगर, बाबरी मस्जिद चौक का जैन मंदिर चौक, रहमान गली का राम गली, मुस्तफाबाद का धर्मपुरा और मौलाना जफ़र अली खान चौक का लक्ष्मी चौक करने का आदेश निकाला जा रहा था। इधर, घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक राज्यों के संघ भारत में एक अदालत 700 साल पुरानी कमाल मौला मस्जिद को हमेशा के लिए एक मंदिर में बदलने का फैसला सुना रही थी। 

मध्यप्रदेश के धार जिले की कमाल मौला मस्जिद – भोजशाला प्रकरण में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ का आदेश कुछ ऐसा है जैसे निष्कर्ष पर पहले पहुँचा गया  और उसके लिए ‘तर्क’ बाद में जुटाए या उसके अनुकूल व्याख्यायित किये गए हों ।

15 मई को  हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका को केंद्र में रखते हुए मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खण्डपीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी ने 6 अलग अलग रिट याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया और मुख्य याचिकाकर्ता की अधिकाँश बातें मानते हुए विचाराधीन पुरातात्विक स्मारक को सरस्वती का मंदिर घोषित कर दिया।

इसी के साथ मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज अदा किये जाने के कोई 90 वर्ष पुराने, समय समय पर पुनः जारी किये जाते रहे आदेश रद्द कर दिए। सरकार और एएसआई – आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया – को इस भवन के संरक्षण, प्रबन्धन, संस्कृत के प्रशिक्षण,  ब्रिटिश म्यूजियम में रखी सरस्वती की कथित मूर्ति को वापस लाने के प्रयत्न जैसे कई निर्देश भी दिए। 

सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या प्रकरण की तर्ज पर इस फैसले में भी कहा गया है कि “दोनों पक्षों के साथ पूरी तरह न्याय करने और मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए उन्हें, अगर वे मांगते हैं तो, मस्जिद बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा धार में जमीन देनी चाहिए।“ 

इंदौर हाईकोर्ट का 243 पृष्ठ का यह आदेश ना तो निर्णय कहा जा सकता है, न न्याय :  यह विचाराधीन विषय का न तो सही निदान करता है, ना ही समाधान। इसका आधार ना तो बिना किसी संदेह के सत्य तक पहुंचाने वाला प्रमाण है ना ही विधि द्वारा निर्धारित नियम और विधान। इसी के साथ चूंकि यह भविष्य में इस्तेमाल की जा सकने वाली नजीर बन सकता है ठीक इसीलिए चिंता का सबब अलग से है। 

कमाल मौला मस्जिद का इतिहास आज का नहीं है। बाबा फरीद के शिष्य, सूफी संत कमालुद्दीन मौला मालवी के नाम से यह तेरहवीं शताब्दी से मौजूद है। सन 1331 में इसका निर्माण किया गया। इस इमारत पर लिखी इबारत में दर्ज है कि इसकी मरम्मत 1392-93 में मालवा के सूबेदार – गवर्नर – दिलावर खान गौरी ने कराई थी। मतलब यह उसके पहले से मौजूद थी।

अकबर अपनी बादशाहत के दौर में 1598 में यहाँ से गुजरे, जहांगीर 1617 और औरंगजेब 1684-85 में आये। उनके दौरों के रिकॉर्ड सहित इतिहास के दस्तावेजो में जब भी इसका जिक्र आया कमाल मौला मस्जिद के रूप में ही आया। इमारत की स्थापत्य कला और भवन निर्माण के तरीके में कहीं भी मंदिर की झलक नहीं मिलती। मन्दिरों में मिहराब या मिम्बर नहीं होते, उनकी ऊंचाइयां भी इतनी नहीं होतीं जितनी इसकी है।  

इन पूरे 700 वर्षों के इतिहास में वर्ष 1903 से पहले कभी भी, किसी ने भी यहाँ सरस्वती या कोई और मन्दिर होने की बात नहीं कही। 1903 में पहली बार यह बात तब शुरू हुई जब तबके एएसआई डायरेक्टर केएन दीक्षित ने ब्रिटिश म्यूजियम में एक प्रतिमा देखी और उसे सरस्वती बताया। हालांकि उस प्रतिमा पर जैन देवी अम्बिका लिखा था और उसे जैन मूर्तिकार वररुचि ने बनाया था, इस बात के भी उल्लेख थे। इसी तरह इस इमारत के साथ भोजशाला का संबोधन जुड़ने की कहानी भी कोई पुरानी नहीं है।

पहली बार इसका उल्लेख 1906 में एक ब्रिटिश गजेटियर में मिलता है,  वह भी ‘हॉल ऑफ़ भोज’  के रूप में :  भोजशाला शब्द में भी शाला का मतलब विद्यालय या पाठशाला के नहीं ‘स्थान’ या जगह के अर्थ में है।  गरज यह कि इस इमारत के 700 वर्ष के लिखित और दस्तावेजी इतिहास के मुकाबले महज 120 वर्ष पहले की कुछ व्यक्तियों की धारणाओं को ही प्रमाण मानकर इसका रूप ही बदल दिया गया है। 

इन धारणाओं की भी आंशिक और अधूरी, कुछ मामलों में मनमानी व्याख्या की जा रही है। जैसे प्रतिमा के सरस्वती होने के बारे में जिन सी पी लेले के 1903 में दर्ज किये गए एक विवरण का प्रमाण की तरह हवाला दिया गया, मगर इसी के साथ उनके द्वारा इसके पुराने शहर में पाए जाने वाली बात को नहीं माना गया। जबकि पुराने धार शहर में महल और उसमें स्कूल दोनों हैं। ऐसे उदाहरण अनेक हैं यहाँ उनमें से कुछेक का ही जायजा लेना काफी है। 

जैसे इमारत के निर्माण में इस्तेमाल की गयी सामग्री को ही ले लें। याचिकाकर्ताओं के इन्हें प्रमाण मानने के दावे पर हाईकोर्ट ने आँख मूंदकर विश्वास कर लिया है जबकि पुराने भवनों के भग्नावशेषों का उपयोग करना एक आम बात है। मगर फिर भी इस दोबारा उपयोग में लाई गयी सामग्री का सरस्वती या उनकी पूजा से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है।  पत्थरों पर उकेरी गयी जो भी लिखावट संस्कृत या प्राकृत भाषा में मिलती है उसका जितना भी संबंध है वह उस जैन धर्म के साथ है, जिस जैन मन्दिर के यहाँ होने का कोई इतिहास नहीं है। 

पत्थरों पर उकेरे गये जिस अभिलेख को संस्कृत के व्याकरण के जटिल सूत्र होने का दावा किया जा रहा है वे जैन परम्परा से संबंध रखते हैं। उस कालखंड में प्रचलित एक जैन नाटक के अंश हैं। समय समय पर इसे पढ़ने और इनका अनुवाद करने वालों ने भी यह बताया है। इस तथ्य से बचने के लिए हाईकोर्ट के इस आदेश ने जो रास्ता चुना है वह और भी ज्यादा चिंता पैदा करने वाला है। हाईकोर्ट कहता है कि जैन कोई अलग धर्म नहीं है, यह हिन्दुइज्म की ही एक शाखा है।

इस कमाल के निष्कर्ष पर पहुँच कर हाईकोर्ट के विद्वान जज सिर्फ मस्जिद कमाल मौला को मन्दिर घोषित करने तक ही नहीं रुकते बल्कि पृथ्वी के इस हिस्से पर जन्मे और विकसित हुए सबसे पुराने अनीश्वरवादी धर्म.  जैन धर्म को भी हिन्दू धर्म घोषित कर देते हैं। इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए अदालत ब्रिटिश म्यूजियम में रखी अम्बिका की मूर्ति पर लिखे ‘जैन विद्यादेवी’ की व्याख्या करते हुए कहती है कि विद्या की देवी सरस्वती होती है इसलिए यह सरस्वती है।

जबकि जैन धर्म की देवियों में सरस्वती नहीं है। उस प्रतिमा के नीचे पदमासन लगाए बैठे साधकों और तीर्थंकरों की उपस्थिति को इस आधार पर सामान्य बताती है क्योंकि यह सिद्धांत पहले ही गढ़ा जा चुका है कि  जैन और हिन्दू धर्म एक ही हैं।

लगता है इस आदेश में याचिकाकर्ता हिन्दू फ्रंट की काफी रोचक सूचनाओं और अन्धविश्वास को ओढ़ाये गए छद्म विज्ञान को बिना किसी टीका टिप्पणी या समालोचना के प्रमाण जैसा मान लिया गया है। मूर्तियों में की जाने वाली प्राणप्रतिष्ठा की वैज्ञानिकता, उसे क्वान्टम विज्ञान से जोड़ने पर पूरे दो तीन पैराग्राफ हैं और मजे की बात यह है कि इसमें आईंस्टीन के एक उद्दरण का भी सहारा लिया गया है।  

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उन्होंने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों और अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है। ये 10 सिद्धांत सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश के एडवोकेट जनरल ने रखे थे। अयोध्या प्रकरण संपत्ति के स्वामित्व का विवाद था, इसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद परिसर में चोरी छुपे मूर्ति रखे जाना और 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना दोनों को गलत और आपराधिक काम माना था।

इसके बाद भी दिए फैसले का कानूनी आधार क्या था यह बात बाद में सीजेआई बने डीवाई चंद्रचूड़ ने खुद पुणे में अपने पैतृक गांव के लोगों को बताई थी कि “रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में मैं भगवान के सामने बैठ गया और उनसे प्रार्थना की कि कुछ न कुछ ना कुछ हल निकालना होगा होगा।“  

अयोध्या प्रकरण इसलिए भी आधार नहीं बन सकता क्योंकि वह स्वयं एक अपवाद है।  भारत की संसद 1991 में ही पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 पारित कर चुकी है और धरती के इस हिस्से का क़ानून वही है। यह एकदम स्पष्ट शब्दों में प्रावधान करता है कि (बाबरी मस्जिद – राममन्दिर विवाद को छोड़कर)  “15 अगस्त, 1947 को विद्यमान किसी पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र वही बना रहेगा जो उस दिन था।“

यह भी कि “यदि इस अधिनियम के प्रारंभ होने पर, 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप के रूपांतरण के संबंध में कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण के समक्ष लंबित हो, तो वह समाप्त हो जाएगी, और ऐसे किसी मामले के संबंध में कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही ऐसे प्रारंभ होने के बाद किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण में नहीं होगी।“ 

जब क़ानून यह कहता है तो 2024 में जस्टिस धर्माधिकारी ने फिर से सर्वे के आदेश कैसे दिए?  2022 में  मस्जिद कमाल मौला – भोजशाला को लेकर हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस की रिट याचिका सुनवाई के लिए कैसे मंजूर की गयी और 15 मई 2026 को उस पर फैसला कैसे सुनाया गया? 

इसमें दो बातें गौरतलब हैं : एक, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका, उन्हें इसके ‘वास्तविक रूप’ के निर्धारण के लिए पुनः सर्वेक्षण के हाईकोर्ट के 2024 के आदेश को रोकना चाहिए था मगर उन्होंने जनवरी 2026 में कुछ सुरक्षा उपायों के साथ इसकी अनुमति दे दी।  इसके लिए प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 की धारा 4(3) में निहित एक खामी का इस्तेमाल किया गया। जो सिवाय प्रक्रियात्मक छलावे के और कुछ नहीं।

सीजेआई के कहे का एक मतलब यह भी है कि पूजा स्थल क़ानून दीवानी मुकदमों पर रोक लगाता है, जनहित याचिकाओं पर नहीं !! इस तरह की व्याख्या 1991 के यथास्थिति बनाए रखने के क़ानून को हटाये बिना ही उसे खोखला और अनुपयोगी बना देना है। पूरी तरह ध्रुवीकृत और तेजी से ध्रुवीकृत किये जाने वाले समय में अदालतों की भूमिका पर राजनीतिक ध्रुवीकरण का असर नहीं दिखना चाहिए : मगर दुर्भाग्य से ऐसा होता जैसे दिखना चाहिए,नहीं दिख रहा।  

असल में यह एक शुद्द राजनीतिक परियोजना का हिस्सा है। जितने भी याचिकाकर्ता थे, उनमें से मुस्लिम पक्ष को छोड़कर सभी या तो सीधे भाजपा के साथ संबद्ध थे या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों का हिस्सा थे। यह जानकारी उनका परिचय देते हुए खुद हाईकोर्ट ने दर्ज की है।

इनमें से एक के परिचय में हाईकोर्ट ने उन्हें ‘’अंतर्धार्मिक विवाहों को रोकने के काम में जुटा” बताया है :  बेगानी शादी में अड़ंगेबाजी का कृत्य असंवैधानिक और आपराधिक है यह बात माननीय उच्च-न्यायालय की जानकारी में नहीं है, ऐसा मानकर चलना उसकी अवमानना करना होगा। इस तरह याचिकाकर्ता भाजपा झंडाधारी और इस तरह एक ख़ास एजेंडा धारी थे।  अब वे कमाल मौला मस्जिद – भोजशाला प्रकरण में हुए इस आदेश का डंडा घुमायेंगे और कल्पित इतिहास के कुहासे में भविष्य के रोशन होने की संभावनाओं को आशंकाओं तक पहुंचाएंगे। 

यही चिंता है जिसके चलते केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह किया जा रहा है कि वे इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दें। अदालतों से अनुरोध किया जा रहा है कि वे, जिस धर्मनिरपेक्षता सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान का अपरिवर्तनीय और बुनियादी हिस्सा बता चुका है, उसे कमजोर करने की हर कोशिश को असफल करें।  

पुनश्च:

इसे यदि संयोग कहा जाए तो सचमुच ज्यादा ही विरला संयोग है कि 15 मई के हाईकोर्ट आदेश के ठीक एक दिन पहले इस आदेश को लिखने वाले जज जस्टिस विजय कुमार शुक्ला के बेटे को मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में ही सरकारी वकील के रूप में नियुक्त करने का आदेश भी जारी हुआ। इसने 2019 में अयोध्या प्रकरण के बाद तबके चीफ जस्टिस की राज्यसभा में नियुक्ति और पांच सदस्यीय पीठ के एकमात्र मुस्लिम सदस्य के राज्यपाल बनाए जाने के संयोग की याद ताज़ी कर दी है। 

अब संयोग का क्या किया जाये, वे संयोग ही होते हैं। मगर न्याय के मामले में यह बार बार कहा जाता है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए और एक पुरानी कहावत भी है कि सीजर की पत्नी को संदेहों से ऊपर होना चाहिए।        

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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